कटिहार सदर अस्पताल: इलाज से पहले रिश्वत, दवाई से पहले दलाली
कटिहार सदर अस्पताल का हाल अब ऐसा हो गया है कि बीमारियां ठीक हो न हों, लेकिन भ्रष्टाचार जरूर चढ़ जाएगा। जच्चा-बच्चा की मौत पर एक्शन का ढोल पीटा गया। पर सजा इतनी कि सुनकर हंसी भी आए और गुस्सा भी। दो नर्सों को शिफ्टिंग हुई और एक डॉक्टर को शो-कॉज हुआ। यानी किसी की जान चली गई, और सजा मिली जैसे क्लास में होमवर्क अधूरा करने पर। अब जरा दूसरी दिलचस्प कहानी सुनिए… मनिहारी की काजल कुमारी 16 घंटे तक अस्पताल के गलियारों में घूमती रहीं, पर इलाज शुरू नहीं हुआ।

क्यों.. क्योंकि नर्स मैडम और बाबुओं की डिमांड थी पहले दो-चार हजार की नज़राना चाहिए। रिश्वत नहीं दी तो कभी दवा नहीं है, कभी डॉक्टर नहीं है का राग अलापा गया। और ट्विस्ट ये है कि काजल के ससुर निकले बीजेपी के प्रखंड अध्यक्ष लक्ष्मण सहनी, फोन-टोन सब लगवाया, सोर्सेज़ एक्टिव किए, पर लेबर वार्ड वालों ने साफ हाथ खड़े कर दिए। अब नेताजी खुद अस्पताल से तौबा कर चुके हैं और कह रहे हैं भ्रष्टाचार का ये खेल मुख्यमंत्री तक पहुंचेगा।

यानी कटिहार सदर अस्पताल में मरीजों की जान की कीमत ₹2000 घूस है, इलाज की गारंटी नहीं, लेकिन अपमान और परेशानियों की फुल डोज पक्की उपलब्ध है। बिहार सरकार जहां स्वास्थ्य सुविधाओं का विज्ञापन करोड़ों में चलाती है, वहीं हकीकत ये है कि सदर अस्पताल में इलाज नहीं, बल्कि “रिश्वत की पर्ची” सबसे जरूरी दवा है।
