ताड़पत्रों में सहेजी जा रही मिथिला की हजारों वर्षों पुरानी विरासत

पूर्णिया के विद्वान पंडित विद्यानंद झा दुर्लभ पांडुलिपियों को डिजिटलीकरण कर बचा रहे इतिहास

आधुनिकता और डिजिटल युग के इस दौर में जहां लोग अपनी पुरानी परंपराओं और विरासतों से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं, वहीं बिहार के पूर्णिया जिले में एक ऐसे विद्वान मौजूद हैं जो सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर को बचाने में जुटे हुए हैं। पूर्णिया निवासी विद्वान पंडित विद्यानंद झा वर्षों से ताड़पत्रों पर लिखी दुर्लभ पांडुलिपियों, मिथिला की वंशावली और पारिवारिक परंपराओं को सहेज कर रखे हुए हैं। वे न सिर्फ इन अमूल्य धरोहरों का संरक्षण कर रहे हैं, बल्कि आधुनिक तकनीक की मदद से उनका डिजिटलीकरण भी कर रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी संस्कृति और इतिहास को समझ सकें।

लाल, पीले और सफेद कपड़ों में बेहद सावधानी से लपेटकर रखे गए ये ताड़पत्र आज भी मिथिला की हजारों वर्षों पुरानी परंपरा की गवाही देते हैं। इन पांडुलिपियों में मिथिलांचल के अनेक परिवारों की वंशावली, सामाजिक परंपराएं, धार्मिक संस्कार और ऐतिहासिक घटनाओं का विस्तृत उल्लेख मिलता है। पंडित विद्यानंद झा बताते हैं कि इन ताड़पत्रों में केवल पारिवारिक जानकारी ही नहीं, बल्कि मिथिला की सामाजिक व्यवस्था, विवाह परंपरा और धार्मिक संस्कारों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां भी दर्ज हैं।

उन्होंने बताया कि मिथिला में सदियों से विवाह के समय वर और वधू पक्ष की वंशावली का मिलान करने की परंपरा रही है। इसी परंपरा के तहत ताड़पत्रों पर लिखी वंशावलियों का उपयोग किया जाता था। पंडित विद्यानंद झा के अनुसार, भगवान राम और माता सीता के विवाह के समय भी पूर्वजों की जानकारी और वंश परंपरा का उल्लेख इसी प्रकार की पांडुलिपियों के माध्यम से किया गया था। यही कारण है कि मिथिला की यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

पंडित विद्यानंद झा ने बताया कि इन पांडुलिपियों को सुरक्षित रखना आसान कार्य नहीं रहा। उनके पूर्वजों ने भी इन धरोहरों को बचाने के लिए अनेक कठिनाइयों का सामना किया। कई बार आक्रमणों और सामाजिक उथल-पुथल के दौरान परिवारों को अपना घर-द्वार छोड़कर दूसरे स्थानों पर जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने इन ताड़पत्रों को हर परिस्थिति में सुरक्षित रखा। पीढ़ी दर पीढ़ी यह जिम्मेदारी आगे बढ़ती रही और आज वे स्वयं इस धरोहर को संरक्षित करने का कार्य कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि ताड़पत्र प्राकृतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील होते हैं। समय के साथ नमी, धूल, दीमक और मौसम के प्रभाव से इनके खराब होने का खतरा लगातार बना रहता है। ऐसे में इन पांडुलिपियों की विशेष तरीके से सफाई करनी पड़ती है और उन्हें नियंत्रित वातावरण में सुरक्षित रखा जाता है। अब आधुनिक तकनीक की मदद से इन ताड़पत्रों की स्कैनिंग कर डिजिटल रूप में संरक्षित किया जा रहा है, ताकि भविष्य में इनके नष्ट होने का खतरा कम हो सके।

पंडित विद्यानंद झा का मानना है कि यदि समय रहते इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को सुरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों और सांस्कृतिक इतिहास से अनजान हो जाएंगी। इसी सोच के साथ वे दिन-रात इन पांडुलिपियों को व्यवस्थित करने और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने में लगे हुए हैं। उनका कहना है कि यह केवल मिथिला की नहीं, बल्कि पूरे बिहार और भारतीय संस्कृति की धरोहर है।

इतिहास और संस्कृति के संरक्षण को लेकर उनके इस प्रयास की चर्चा अब जिले से बाहर भी होने लगी है। कई शोधकर्ता और इतिहासकार भी इन ताड़पत्रों में रुचि दिखा रहे हैं। आकाशवाणी पूर्णिया के उद्घोषक निरंजन झा का कहना है कि पंडित विद्यानंद झा का यह कार्य बेहद सराहनीय है। यदि सरकार और प्रशासन की ओर से उचित सहयोग और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो इन अमूल्य पांडुलिपियों को और बेहतर तरीके से संरक्षित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐतिहासिक संपत्ति साबित होगी।

पंडित विद्यानंद झा के इस महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए जिला प्रशासन ने भी उन्हें सम्मानित किया है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि ऐसे लोग समाज के लिए प्रेरणा हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के अपनी संस्कृति और इतिहास को बचाने का कार्य कर रहे हैं।

आज जब दुनिया तेजी से डिजिटल होती जा रही है और लोग अपनी परंपराओं को भूलते जा रहे हैं, ऐसे समय में पूर्णिया के पंडित विद्यानंद झा इतिहास को नई जिंदगी देने में जुटे हैं। ताड़पत्रों में दर्ज सदियों पुरानी जानकारी को डिजिटल स्वरूप देकर वे न सिर्फ मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को बचा रहे हैं, बल्कि पूरे बिहार की ऐतिहासिक विरासत को भी मजबूत करने का काम कर रहे हैं। उनका यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य उपहार साबित हो सकता है।

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