कभी खामोशी में कैद ज़िंदगी… और आज वही हाथ बन गए संवाद की ताकत। बिहार के पूर्णिया जिले के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की कुछ मूक-बधिर बच्चियों ने न सिर्फ अपनी जिंदगी बदली है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए एक मिसाल कायम की है।
अजमती, नुसरत, आंचल और छोटी… ये वो नाम हैं, जो कभी अपने ही घर में अनसुनी और अनकही रह जाती थीं। न सुन पाने की मजबूरी और बोल न पाने की पीड़ा ने इन्हें समाज से लगभग अलग-थलग कर दिया था।
अजमती खातून, जो बचपन से ही न सुन सकती थी और न बोल सकती थी, कभी स्कूल नहीं जा सकी। परिवार के बीच रहते हुए भी वह खुद को अलग महसूस करती थी। लेकिन जब उसके पिता ने उसे कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में दाखिला दिलाया, तो उसकी दुनिया ही बदल गई। आज वही अजमती सातवीं कक्षा में पढ़ती है और सांकेतिक भाषा में अपने सपनों को व्यक्त करती है।
छोटी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। स्थानीय स्कूल ने यह कहकर उसे ठुकरा दिया कि वह न सुन सकती है और न बोल सकती है। लेकिन कस्तूरबा विद्यालय ने उसे अपनाया और आज वह सामान्य छात्राओं के साथ पढ़ाई कर रही है।
आंचल, जिसने अपने पिता को खो दिया, अब खुद शिक्षक बनने का सपना देख रही है, ताकि अपने जैसे बच्चों को नई दिशा दे सके। वहीं नुसरत, जिसे कभी स्कूल में मजाक का पात्र बनाया जाता था, आज पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही है और प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान हासिल कर रही है।
इन बच्चियों की जिंदगी में बदलाव का श्रेय जाता है विद्यालय की विशेष शिक्षण पद्धति को, जहां स्मार्ट बोर्ड और सांकेतिक भाषा के माध्यम से पढ़ाई कराई जाती है।
इस पहल को सफल बनाने में UNICEF India और Bihar Education Project Council का अहम योगदान रहा है। जुलाई 2025 में शिक्षकों को सांकेतिक भाषा की विशेष ट्रेनिंग दी गई, जिसके बाद शिक्षण प्रक्रिया पूरी तरह बदल गई।
अब इन बच्चियों को अलग नहीं बैठाया जाता, बल्कि सामान्य छात्राओं के साथ एक ही कक्षा में पढ़ाया जाता है। डिजिटल कंटेंट, चित्र और वीडियो के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया आसान और प्रभावी बनाई गई है।
परिणाम चौंकाने वाले हैं—जो बच्चियां कभी पढ़ने योग्य नहीं मानी जाती थीं, वे अब परीक्षाओं में 80 से 90 प्रतिशत अंक ला रही हैं। इतना ही नहीं, खेलकूद प्रतियोगिताओं में भी ये बच्चियां जिला और राज्य स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं।
विद्यालय के शिक्षकों का मानना है कि हर बच्चे में क्षमता होती है, जरूरत है उसे पहचानने और सही दिशा देने की।
आज इन बच्चियों के चेहरे पर जो आत्मविश्वास और मुस्कान है, वह इस बात का प्रमाण है कि अगर शिक्षा में समावेशिता और संवेदनशीलता हो, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।
