त्रेता युग से जुड़ी है सुल्तानगंज-देवघर कांवड़ यात्रा की धार्मिक मान्यता

सुल्तानगंज से देवघर तक कांवड़ यात्रा: आस्था, परंपरा और अद्भुत धार्मिक मान्यताओं का संगम

संतोष कुमार सिंह, संवाददाता, भागलपुर/सुल्तानगंज। सावन का महीना आते ही बिहार के भागलपुर जिले का सुल्तानगंज शिवभक्ति में सराबोर हो उठता है। यहां से शुरू होने वाली सुल्तानगंज-देवघर कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, परंपरा और सनातन संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। हर वर्ष सावन में देश के विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु सुल्तानगंज पहुंचते हैं, उत्तरवाहिनी गंगा से पवित्र गंगाजल भरते हैं और करीब 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक करते हैं।

श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सुल्तानगंज में बहने वाली उत्तरवाहिनी गंगा का जल अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसी जल से बाबा बैद्यनाथ का अभिषेक करने पर भगवान शिव प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। यही कारण है कि सावन के प्रत्येक सोमवार और पूरे महीने यहां आस्था का विशाल जनसैलाब उमड़ता है।

त्रेता युग से जुड़ी है धार्मिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने वनवास काल के दौरान सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पैदल देवघर पहुंचकर बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक किया था। माना जाता है कि तभी से इस कांवड़ यात्रा की परंपरा प्रारंभ हुई और आज भी करोड़ों श्रद्धालु उसी आस्था के साथ इस कठिन यात्रा को पूरा करते हैं।

अजगैबीनाथ धाम की अनोखी परंपरा

सुल्तानगंज स्थित अजगैबीनाथ मंदिर की अपनी एक विशेष धार्मिक परंपरा है। मान्यता है कि यहां सरकारी पूजा शुरू होने से पहले श्रद्धालु केवल जल अर्पित करते हैं, जिसे ‘कच्चा जल’ कहा जाता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार यह जल सीधे बाबा बैद्यनाथ को समर्पित माना जाता है। अर्थात श्रद्धालु अजगैबीनाथ शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं और उसका पुण्य बाबा बैद्यनाथ को अर्पित माना जाता है।

सरकारी पूजा संपन्न होने के बाद श्रद्धालु विधि-विधान के साथ फूल, बेलपत्र, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित कर बाबा अजगैबीनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं। इस प्रकार श्रद्धालुओं को एक ही स्थान पर बाबा अजगैबीनाथ और बाबा बैद्यनाथ दोनों की आराधना का आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।

सावन के दौरान सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवड़ यात्रा आज भी लाखों शिवभक्तों की अटूट श्रद्धा, कठिन तपस्या और सनातन परंपरा का सबसे बड़ा प्रतीक बनी हुई है।

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