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सोनम वांगचुक का आंदोलन: अनशन से अस्पताल तक, शिक्षा व्यवस्था को लेकर देशव्यापी बहस तेज

NEET-UG 2026 में कथित अनियमितताओं के विरोध में 21 दिन का अनशन, बिगड़ती तबीयत के बाद पुलिस ने अस्पताल में कराया भर्ती

संवाददाता : इशिता चक्रबोर्ती, नई दिल्ली। शिक्षा व्यवस्था में सुधार और NEET-UG 2026 परीक्षा में कथित अनियमितताओं के विरोध में जंतर-मंतर पर चल रहा सोनम वांगचुक का आमरण अनशन शनिवार को नए मोड़ पर पहुंच गया। करीब तीन सप्ताह तक चले अनशन के बाद दिल्ली पुलिस ने बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति का हवाला देते हुए उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। वहीं आंदोलनकारियों ने इसे शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार में हस्तक्षेप बताया है।

कौन हैं सोनम वांगचुक?

सोनम वांगचुक देश के प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। उन्हें शिक्षा एवं नवाचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। फिल्म 3 इडियट्स का लोकप्रिय किरदार ‘फुंसुख वांगड़ू’ भी काफी हद तक उनके व्यक्तित्व से प्रेरित माना जाता है। पिछले कई वर्षों से वे शिक्षा, पर्यावरण और जनहित के मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं।

क्यों शुरू हुआ आंदोलन?

सोनम वांगचुक और Cockroach Janta Party (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने 28 जून 2026 से जंतर-मंतर पर आमरण अनशन शुरू किया। आंदोलन का मुख्य मुद्दा NEET-UG 2026 में कथित पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया में सामने आई अनियमितताओं को लेकर निष्पक्ष जांच तथा शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग है।

आंदोलनकारियों का कहना है कि देश की प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना आवश्यक है, क्योंकि इससे लाखों विद्यार्थियों का भविष्य जुड़ा होता है।

आंदोलन की प्रमुख मांगें

आंदोलन के दौरान सरकार के सामने कई मांगें रखी गईं। इनमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग, NEET सहित राष्ट्रीय परीक्षाओं में पारदर्शिता, कथित पेपर लीक मामलों की निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई तथा परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार शामिल हैं।

अनशन के दौरान बिगड़ी तबीयत

लगातार 21 दिनों तक चले अनशन का असर सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य पर भी पड़ा। चिकित्सकों के अनुसार उनका वजन करीब नौ किलोग्राम तक कम हो गया। डॉक्टरों ने लंबे समय तक उपवास जारी रहने से स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका जताई थी। इसके बावजूद वांगचुक लगातार कहते रहे कि उनका संकल्प कमजोर नहीं पड़ा है।

हाई कोर्ट का हस्तक्षेप

स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि प्रत्येक नागरिक का जीवन अमूल्य है और सरकार उनकी नियमित स्वास्थ्य जांच सुनिश्चित करे। अदालत ने डॉक्टरों की सलाह के अनुसार आवश्यक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए, हालांकि जबरन फोर्स-फीडिंग का आदेश नहीं दिया।

शनिवार को अस्पताल ले जाया गया

शनिवार सुबह दिल्ली पुलिस और प्रशासन की टीम जंतर-मंतर पहुंची और सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती कराया। पुलिस का कहना है कि डॉक्टरों की सलाह के आधार पर उनकी जान बचाने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया। दूसरी ओर आंदोलनकारियों का आरोप है कि यह कार्रवाई उनकी इच्छा के विरुद्ध की गई।

आंदोलन जारी रहेगा

सोनम वांगचुक के अस्पताल पहुंचने के बाद भी आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है। CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने स्पष्ट किया है कि मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा।

देशभर से मिल रहा समर्थन

आंदोलन को देश के विभिन्न हिस्सों से समर्थन मिल रहा है। CJP ने सामूहिक भूख हड़ताल और संसद मार्च का भी आह्वान किया है। पार्टी का दावा है कि बड़ी संख्या में लोगों ने इसमें शामिल होने के लिए पंजीकरण कराया है, हालांकि इस संख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। कई कलाकारों और सार्वजनिक हस्तियों ने भी आंदोलन के प्रति समर्थन व्यक्त किया है।

विवाद भी बढ़ा

आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर वायरल कुछ वीडियो और तस्वीरों को लेकर विवाद भी सामने आया। कुछ दावों और मंच से लगाए गए नारों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार ने आंदोलन की प्रमुख मांगों पर अब तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है। अदालत में सरकार की ओर से कहा गया है कि सरकारी डॉक्टर नियमित रूप से सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य की निगरानी करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें समुचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।

आगे क्या?

सोनम वांगचुक के अस्पताल में भर्ती होने के बाद आंदोलन नए चरण में प्रवेश कर चुका है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या सरकार आंदोलनकारियों से बातचीत शुरू करेगी, परीक्षा प्रणाली में सुधार को लेकर कोई ठोस निर्णय लिया जाएगा और आंदोलन आगे किस दिशा में बढ़ेगा। फिलहाल यह मामला शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार को लेकर राष्ट्रीय बहस का विषय बना हुआ है।

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