सुमन ठाकुर की विशेष रिपोर्ट, अररिया। देश में डिजिटल इंडिया और हर बच्चे को शिक्षा से जोड़ने की बात कही जा रही है, लेकिन बिहार के अररिया जिले के सीमावर्ती गांवों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव इन दावों पर सवाल खड़े कर रहा है। नरपतगंज विधानसभा क्षेत्र के सीमावर्ती मधुबनी गांव की तस्वीर शिक्षा व्यवस्था और ग्रामीण संपर्क मार्गों की स्थिति को उजागर करती है। यहां ग्रामीणों के अनुसार, सड़क, पुल और पुलिया की पर्याप्त सुविधा नहीं होने के कारण बच्चों को भारतीय क्षेत्र के विद्यालयों तक पहुंचने में परेशानी होती है। नतीजतन, कई बच्चे पढ़ाई के लिए पड़ोसी देश नेपाल के विद्यालयों का रुख कर रहे हैं।

भारत के बच्चे, नेपाल की शिक्षा व्यवस्था

मधुबनी गांव की सबसे चिंताजनक तस्वीर यह है कि भारत में रहने वाले इन बच्चों की पढ़ाई नेपाल के विद्यालयों में हो रही है। ग्रामीणों के अनुसार, भारतीय क्षेत्र में विद्यालयों तक पहुंचने में होने वाली कठिनाइयों के कारण परिवारों को बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए नेपाल का विकल्प चुनना पड़ रहा है।

इस स्थिति का एक दूसरा पहलू भी सामने आया है। बताया जा रहा है कि इन बच्चों को भारत का राष्ट्रगान याद नहीं है, जबकि नेपाल का राष्ट्रगान उन्हें पूरी तरह याद है। बच्चों का मानना है कि यदि उन्हें भारत में ही शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा मिले, तो वे भारतीय राष्ट्रगान और देश से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों को भी बेहतर तरीके से जान सकेंगे।

यह स्थिति बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ उनके सामाजिक और सांस्कृतिक परिचय से जुड़े सवाल भी उठाती है। हालांकि, बच्चों को राष्ट्रगान याद होने या नहीं होने की बात उनके बयानों और उपलब्ध जानकारी के आधार पर ही देखी जानी चाहिए।

सड़क और पुल की कमी बनी बड़ी बाधा

ग्रामीणों के मुताबिक, गांव में सड़क, पुल और पुलिया की समुचित व्यवस्था नहीं होने से भारतीय क्षेत्र के विद्यालयों तक पहुंचना कठिन हो जाता है। आवागमन की इस समस्या का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। परिवारों के सामने चुनौती है कि वे बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए ऐसा रास्ता चुनें, जिससे नियमित रूप से विद्यालय पहुंचना संभव हो सके।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि गांव में बेहतर सड़क संपर्क और पुल-पुलिया का निर्माण कराया जाए, तो बच्चों के लिए भारतीय क्षेत्र के विद्यालयों तक पहुंचना आसान हो सकता है। इससे न केवल शिक्षा की राह सुगम होगी, बल्कि गांव के अन्य लोगों को भी आवागमन में राहत मिलेगी।

विकास के दावों के बीच सीमावर्ती गांव की हकीकत

केंद्र और राज्य सरकारें ग्रामीण क्षेत्रों के विकास तथा सीमावर्ती गांवों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही हैं। केंद्र सरकार का वाइब्रेंट विलेजेज कार्यक्रम भी सीमावर्ती क्षेत्रों के समग्र विकास पर केंद्रित है। इसके बावजूद मधुबनी गांव की समस्या यह सवाल खड़ा करती है कि विकास की योजनाओं का लाभ सीमा पर बसे प्रत्येक गांव तक किस हद तक पहुंच पा रहा है।

ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित विभाग और जनप्रतिनिधि गांव की स्थिति का निरीक्षण करें तथा सड़क, पुल और पुलिया के निर्माण के लिए आवश्यक कदम उठाएं। हालांकि, इस गांव में किसी विशेष योजना के तहत निर्माण कार्य की स्वीकृति या प्रस्ताव की आधिकारिक स्थिति की पुष्टि होना बाकी है।

प्रशासन से समाधान की उम्मीद

मधुबनी गांव के ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनकी समस्या पर प्रशासन गंभीरता से ध्यान देगा और बच्चों को अपने ही देश में शिक्षा प्राप्त करने के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। जरूरत इस बात की है कि गांव की भौगोलिक स्थिति, विद्यालयों तक पहुंचने के रास्तों और बच्चों की वास्तविक जरूरतों का आकलन कर स्थायी समाधान निकाला जाए।

सवाल सिर्फ सड़क और पुल का नहीं, बच्चों के भविष्य का भी है। जब भारत में रहने वाले बच्चों को पढ़ाई के लिए नेपाल जाना पड़े और वे अपने ही देश के विद्यालयों तक आसानी से न पहुंच सकें, तो यह स्थिति व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल खड़े करती है। अब देखना होगा कि संबंधित प्रशासन और विभाग मधुबनी गांव की इस समस्या को दूर करने के लिए कब ठोस पहल करते हैं।